दिल के अंदर कुछ टूट रहा

याद है वो बचपन की जलेबी की दौड़,
बस एक जलेबी की चाह, न कोई सिरमौर।
ये कहा निकल गए हम, था जाना किस ओर ?
अब पीछे मुड़ कर देखता हूँ, तो लगता है कुछ छूट रहा।
बाहर से खुश दिखते हैं ,पर दिल के अंदर कुछ टूट रहा।
वो मेलो में,उन चार आने के खेलों में।
वो फुचके के उन ठेलों में।
वो ज्यादा खा जाने की होड़ माँ की गरम कचौड़ी में।
तनिक बुरा न लगता था ,घिसे चप्पल की भागा दौड़ी में।

वो तितलियों के पीछे भागना और उनके घरों को सजाने में।
बिजली गुल हो जाने पर ,देर रात गपियाने में।
वो बौखलाना खुद पर रोज नए रूटीन का कुछ भी न कर पाने में।
और सुबह सुबह माँ की फटकार,किताब पर गिर जाने में।
कितनी तरकीबें लगाते थे हम दूरदर्शन पर फिल्मे पूरी शिद्दत से देखे जाने में
और माँ को ताने देते थे ,कुछ नया चाहिए खाने में।

अब देखता हूँ जब दूर से खुद को तो लगता है भोला सा मन वो घुट रहा।
सब कुछ तो ठीक ही लगता है, पर दिल के अंदर कुछ टूट रहा।

वो रजाई की गुफाओ में और रेत की सुरंगो में दिल धड़क सा जाता था कटने पर उड़ती पतंगों में।
पैसे खूब जुटाते थे हम खाने को चौमिन के ठेलों में।
जान झोंक देते हम उन बेमतलब के खेलों में।
खूब मौज हम करते थे परीक्षा खत्म हो जाने में।
प्राण सुख से जाते थे परिणाम को घर तक लाने में।
कभी बुरा न लगता था खुद के छोटे हो जाने में।
संकोच कभी न करते हम यारों को गरियाने में।
मज़ा और ही होता था घर वाले खेलों में रोल निभाने में।
खूब जतन हम करते थे पकड़ने परिंदे गेहूं के दाने में।
अब कहते है ज़िन्दगी की बाधाओं को तू कूट रहा।

सब कुछ तो ठीक ही लगता है,पर दिल के अंदर कुछ टूट रहा।
रोम रोम खिल उठता था बारिश में भीग जाने में।
मज़ा अलग ही होता था बरसाती नाले में नाव चलाने में।
उस आंधी में ,बेमतलब कूदा फन्दी में ,खाना चख लेना हांडी में।
अब मजा कहा वो आता है इन सोने और चांदी में।
अलग स्वाद ही होता था गर्मी की बर्फ मलाई में।
कितने खुश हो जाते थे हम बाँध नकली घड़ी कलाई में।
रोज़ ध्यान से सुनते थे हम दादी की उसी कहानी को।
खूब मज़े से पीते थे शरबत और नीम्बू पानी को।
अब लगता है मेरे आगे पर्वत का सीना भी टूट रहा।
कितनी चढ़ाईयां चढ़ ली हमने पर जाने क्या पीछे छूट रहा।
सब कुछ तो ठीक ही लगता है,पर दिल के अंदर कुछ टूट रहा

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कहते हैं ,एक ब्रह्मा है।

कहते हैं, एक ब्रह्मा है,और उसकी रची एक दुनिया है ।
पड़ जाये उसकी नज़र जिस ओर,वही हरियाली, उस ओर ही सारी खुशियां हैं।

और जो मूंद ले वो आँखे, तो खत्म ये सारी दुनिया है।
पर कुछ नहीं मानते,कहते है ,”जो दिखती है ,बस वही हमारी दुनिया है ।
इसके परे ,न तो जीवन है और न ही ऐसी कोई दुनिया है ।”
चलो मान लेते है इनकी बातों को,पर बहस से जरा अलग जा कर देखते है चीजों को ।
देखे ज़रा की क्या समझ पाएंगे हम उस विशाल बरगद के उन छोटे से बीजों को ?
चिड़ियों की चहचाहट से उठता वो कुम्भार है।
नहा धो कर अब उस मिटटी को अपने ख़्वाबों की मूर्तियों में बदलने को तैयार है।
लोग कहते है,”उसकी हाथों में जादू है, मिटटी में जान दाल देता है ,क्या खूब कलाकार है!”
हमारे बचपन का खिलौना,त्योहारों का दिया,गर्मी की ठंढक और अंतिम पड़ाव पर बरगद पर लटका वो कलश, हमारी हर छोटी से बड़ी चीजों में शामिल वो कुम्भार है ।
इन मिटटी के ख्वाबों से चलाता वो अपना घर बार है।
ये मिटटी ही उसकी दुनिया उसका संसार है ।

दिन भर उलझा रहता है वो, उसकी एक छोटी सी दुनिया है।

पर आँखे मूंदते ही ,जैसे विलीन हो जाती उसकी ये सारी दुनिया है।
शून्य सा हो जाता है वो और इस शून्यता में गुम हो जाती उसकी दुनिया है।
कहते है एक ब्रह्मा है,और उसकी रची एक दुनिया है ।
कहते है पड़ जाये उसकी नज़र जिस ओर,वही हरियाली, उस ओर ही सारी खुशियां हैं।

और जो मूंद ले वो आँखे, तो खत्म ये सारी दुनिया है ।।

बहुत कुछ कर जाते हम

बहुत कुछ कर जाते हम ।
खुद को ही जीत जो पाते हम।
लगती दुनिया से जो लड़ाई है।
अपने भीतर ही गहरी खाई है।
वो झूठा है ,वो सच्चा है,न जाने वो क्यों ऐसा है ?
बना दे भस्मासुर हमे मन ये अपना ही ऐसा है।
लगती है कौन अच्छी तुम्हे बताओ दादी या नानी में ?
बचपन से ही तौलने लगते है हम चीजों को लाभ और हानि में।
ये तेरा है ये मेरा है और फिर तो सब कुछ ही मेरा है।
सब कुछ पा कर भी अब ना जाने क्या ये फेरा है।
वो सुन्दर है,वो बन्दर है।
ये मस्जिद और वो मंदिर है।
देखो तो एक खुदा ही बैठा हम सब के अंदर है।
जग को खुशहाल बनाते हम।
फासले कुछ काम कर पाते हम।
बहुत कुछ कर जाते हम।
खुद को ही जीत जो पाते हम।

ये महल है वो खँडहर है।
मन में ये जो चल रहा जाने वो क्या बवंडर है ?
दौड़ना है,अब भागना है,उड़ कर ऊंचा सा दिखना है।
इस ऊँचे दिखने के चक्कर में अपना सब कुछ ही बिकना है।
मान और सम्मान बस एक ही है और वो तो बस ये पैसा है।
बिन पैसे के इंसान यहाँ लगता पागल के जैसा है।
और ज्यादा और तेज़  मिलकर सब जोर लगाते है।
इंसानियत को बेच कर चलो मशीन बन जाते है।
ये आस्था और संस्कार को छोड़ कर आगे बढ़ जाते है।
और महंगी सी चटाई पे योग दिवस मनाते है।
नफरत की इस दुनिया में प्यार ज़रा भर पाते हम।
आतंकवाद ,युद्ध या हो कोई विवाद सारे मसले सुलझाते हम।
खुद के भीतर ही झाँक जो पाते हम।
बहुत कुछ कर जाते हम।
खुद को ही जीत जो पाते हम।

 

किस्से

बदलते हैं किस्से,नई होतीं कहानियां।
बिकता वही हैं,जो मांगे ये दुनिया ।।
ख़ुशी हैं मुझे की मैं हूँ इनका अंश ।
न कृष्णा बन सका मैं हूँ इनका कंश।
सोचो जरा तो अनोखे ये किस्से ।
हैं हम इनमे शामिल तो कभी हमारे ये हिस्से ।
मुझसे पहले कहीं भी जाते ये किस्से।
हूँ मैं अलग सा पर अलग सा ही बताते ये किस्से।
कुछ जो मैं बोलूं तो कुछ और ही बोल जाते ये किस्से।
मेरे हाव भाव और रंग रूप से ही बन जाते ये किस्से।
और कभी मेरी कहानियों को सुन कर ही बड़े हो जाते ये किस्से।
उस अँधेरे में मुझको डराते ये किस्से।
ढूँढू मैं खुद को तो मेरे वज़ूद पे ही सवाल उठाते ये किस्से।
चमकता हूँ जो आसमा में तो धरती से ताली बजाते ये किस्से।

कानों में घुस कर आँखों के आगे तस्वीर बनाते थे किस्से।
उस अंधे की दुनिया में भी रंग भर जाते थे किस्से।
कुछ अलग से थे पुराने वो किस्से।
जहां मरते रावण से लक्ष्मण भी कुछ सीखे।
अब तो नायकों को देख कर लिखें जातें हैं किस्से।
और राम की चाटुकारिता में लग जातें हैं किस्से।
बड़े आजादख़याल होतें थे पुराने वो किस्से।
जहाँ नायक खलनायक होते थे अपने हिस्से।
अब तो चाँद पैसों में ही बिक जातें हैं किस्से।
खलनायक को नायक बनाते हैं किस्से।
और एक ही पहलु में सिमट जातें हैं किस्से।
पर इसमें कहाँ थी इन किस्सों की कमियां।
बदलते हैं किस्से नई होतीं कहानियां।
बिकता वही है जो मांगे ये दुनिया।।

उड़ने को अब चला परिंदा

उड़ने को अब चला परिंदा,आसमान में पंख पसारे ।

पंखों पर है उसे भरोसा चुन लेगा सब नभ के तारे।

उमड़ घुमड़ कर गरज रहे हैं बड़े भयंकर बादल कारे।

खुश हो जाता था वो देख के काले बादल सारे ।

सोचता था वो अंधियारे में निकलेंगे सब नभ के तारे ।

सोचा उसने उड़ने से पहले,बुजुर्गों से कुछ तरकीबें विचारे ।

हैरान थे वो बुढ़े परिंदे देख नन्हें परिंदे के हौसले वो सारे।

मिसालें खूब दी उन सब ने कि ,” तारों के पीछे कितने वीर गए मारे ।

हौसले से नहीं पहुँच सकते वहाँ तक,क्या लोहे से मजबूत हैं पंख तुम्हारे ?

क्यों सोचते हो बकवास ये चीजें, जिस में इतनी तकलीफ है प्यारे ?

रातों में तो घोसलों के बगल में ही घूमते हैं ये जुगनु सारे।

वो भी तो रौशनी करते ही हैं,और मिल जाते बिन पंख पसारे।

आराम से घर बैठे ही इन जुगनुओं से सज जाएंगे घोसले ये सारे।

मूरख ही है वो लोग जो तारों के पीछे उमर गुजारें।

मानो हमारी बात तुम भी, मत जाओ तारों पे वारे।

कल ही सीख लो उल्लू से चुगने नन्हें जुगनु ये सारे।

अलग से ही होते हैं कुछ, जो पा लेते हैं नभ के तारे।

इतने छोटे पंखों वाले नहीं देखते सपनों में तारे।”

निराश परिंदा चला वहाँ से सोचता मन में बातें वो सारे।

अपने घोसले से देख रहा था वो आसमान में आ गये थे तारे।

तभी,इक चमकीली छड़ी सी गरजी और बरसने लगे मेघ वो सारे।

अचानक वहाँ आ गिरा एक परिंदा अपने पंख पसारे।

नन्हा परिंदा घर ला कर मरहम पट्टी कर उसे निहारे।

होश में आते ही परिंदा तारों की कहानियां बखारे।

नन्हे परिंदे ने पूछा, “क्यों करते हो ये सब,क्या रखा है तारों में प्यारे?”

परिंदे ने कहा,”उड़ना तो नियति है अपनी, तो उड़ने में कोई क्या जीते और हारे?

घोसलों में बैठने को नहीं बने हम,उड़ने को हैं ये पंख हमारे।

इन तारों को चुन कर लाएंगे, तो स्वर्ग बना देंगे घोसलों को सारे।

देखो ये नन्हे जुगनु जब छान लाते हैं तारों से ही रौशनी वो सारे।

तो इतने बड़े हो कर भी हम सब,क्यों बिन कोशिश के यूँ हिम्मत हारे?”

उड़ने को अब चला परिंदा,आसमान में पंख पसारे ।

उड़ना तो नियति है उसकी, तो उस में भला क्या वो हारे?

पंखों पर है उसे भरोसा चुन लेगा सब नभ के तारे।।

दिवाली

दिवाली की छुट्टियों में फ्लाइट में बैठे,

अपने गाँव क ऊपर से देख कर एक तरंग

सी दौड़ जाती है जैसे उस बंजारे इंजीनियर

के मन में ।

हँस कर खुद से पूछता है, “हरियाली तो

यहीं है,तो फिर क्यों भटक रहा है तू उस अन्जाने से बन में ?”

आँखों में आंसू के मोती लिए वो सोचता है,

“ये दिवाली कुछ ऐसी आए कि फिर यहीं

इस गाँव में ही बस जाए ।

फिर अगली दिवाली की आस में

बूढ़े माँ-बाप की उम्र ना यूँ ही बीत जाए ।

चलो इस बार एक ऐसा दिया हम जलाए।

जिस की रौशनी से पूरे गाँव को ही रौशन कर जाए ।

मैं बाती बन जाऊँगा, लौ तुम बन जना ।

उन आंधीयों में यार बस साथ तुम निभाना ।

मिल जाएं जो हम सब तो क्या मुश्किल है अंधियारा मिटाना?

तो फिर रौशनी की खातिर जलने से क्या घबराना ?

चलो हम सब कुछ यूँ मिल जाएं

कि एक नई किरण फिर से लाएं ।

मिल कर एक ऐसा जहां हम बनाए

जहाँ हर दिन ही दिवाली बन जाए ।

ये दिवाली कुछ ऐसी आए कि फिर यहीं इस गाँव में ही बस जाए ।”

जिन्न !

एक बच्चे ने जिन्न की एक कहानी पढ़ी ।

जिन्न को पाने की उसकी तमन्ना होने लगी बड़ी ।

अब स्कूल का होमवर्क हो या खेल में भागा दौड़ी ।

हर पल यही सोचता कि एक जिन्न होता तो होती आसानी बड़ी ।

तभी विदेश वाले मामाजी घर आए ।

पीनी हो कोई कोल्ड ड्रींक या महँगी वाली आइसक्रीम

झट से सब मिल जाए ।

देख के ये जादू सारे वो मामा से पूछे जाए

मिला है कोई जिन्न आपको तो पता उसका मुझे भी आप बताएं ।

बचकाने उसके सवाल को सुन मामा भी खूब मुसकाए ।

पर बार बार एक ही सवाल को सुन वो ज़रा घबराये ।

कहा उन्होंने, ” हाँ होते हैं ये जिन्न,पर पाने को उनको

कड़ी मेहनत करनी पड़ती है रात दिन ।

जो माँगो दे देते हैं, पर ले जातें हैं चैन वाली नींद
तुम्हारी और खुशियां तुम से छीन ।”

” पर मामा आखिर रहते कहाँ हैं ये जिन्न ? ”

“दूर यहाँ से बड़े शहरों में,काँच के ऊँचे बंगलों में रहते हैं ये जिन्न । ”

मामा तो लौट गये पर उस बच्चे के मन में मानो बैठ गया वो जिन्न ।

यारों के संग गप्पों में अब आ जाता था जिन्न ।

कहानियां तो जैसे पूरी न होतीं उसके बिन।

टीवी में बड़े काँच के बंगलों में भी ढूँढता था वो जिन्न ।

 

“Congrats Mr Rahul ,You have been promoted as General Manager of the Company.”

भीड़ खड़ी थी उस हॉल में हर शख्स मुसका रहा था ।

कोई शाबाशी दे रहा था तो कोई पीठ थपथपा रहा था ।

पर उस बच्चे को बरसों से खोया उसका जिन्न नज़र आ रहा था ।

शोर बहुत थी उस हॉल में पर वो कहाँ कुछ सुन पा रहा था ।

उसके भीतर मानो कोई पुराना अटका हुआ कैसेट बजता ही जा रहा था ।

” हाँ होते हैं ये जिन्न,पर पाने को उनको

कड़ी मेहनत करनी पड़ती है रात दिन ।

जो माँगो दे देते हैं, पर ले जातें हैं चैन वाली नींद तुम्हारी और खुशियां तुम से छीन ।”