आज़ादी

उन छुट्टीयों की सुस्ताई सुबह, जब धुप की नन्ही किरणें खिड़कियों से झाँकतीं हैं ।

उस अलसाई रजाई को छोड़,बाहर ठंढे आसमान के नीचे धुप सेकती ,

आसमान की ओर मुँह किये हुए कुर्सियों में से एक को अपनाता हूँ ।

उन कुर्सीयों के संग मैं भी आसमान को देखता हूँ, एक टक बस देखता ही जाता हूँ ।

कुछ देर बाद वो भी आ जाती हैं,मेरे और कुर्सियों के संग आसमान की ओर नजरें उठातीं हैं ।

हम चारों उस ठंढे आसमान के नीचे ,बर्फ से जमे हुए देखे जा रहे हैं उसे ।

एक ये कुर्सियाँ हैं,जो जब भी बाहर आतीं हैं,उस नीले आसमान को ही तकती जातीं हैं ,

देखतीं हैं उन परींदों को,और अपने बीते दिन याद करतीं हैं,जब इनकी शाखाओं पे थके

परींदें आते थे और उन गर्म आसमानों में भी इनके हिलोरों से सूकून पा कर सो जाते थें ।

एक मैं हूँ ,जो कल की बोझिल थकान से निकल,उस खुले आजा़द आसमान को देख युँ ही मुसका रहा हूँ ।

और एक वो हैं, जो पता नहीं उस चमकीले,सुस्ताए आसमान में कुछ ढूंढ पातीं हैं या युँ ही हमारा साथ निभातीं हैं ?

हमारे बगल में ये नन्ही हवायें उन बिखरे हुए पत्तों से खेल रहीं हैं ,हम इन हवाओं से अपने चेहरे नहीं धोतें न ही उनमें से कुछ को अपनी साँसों में भर,बाकियों को अपने बालों की मालिश करते हुए गुज़रने देते हैं ।

हम चारों बस कुछ बठै,कुछ लेटे ,एक से ही उस आसमान को देखे जाते हैं ।

उनकी आवाज़ सुन कर मानो ये नन्ही हवायें डर से दुबक जाती हैं और उन पत्तों की आवाज़ भी रूक जाती है ।

ये अचानक ही पुछती हैं, “अगर तूम आजा़द होते तो क्या करते ?”

उनके संजीदा सवाल से अछूता, मैं उन नन्ही चिड़ियों को देखता हूँ,वो फुदक रहीं रहीं

हैं,चहक रहीं हैं,कभी खेल रहीं हैं तो कभी एक ननद भाभी सी एक दुसरे पर मजाक कर युँ ही बिदक रहीं हैं ।

अपने सवाल की संजीदगी पर शक करते हुए वो दोहरातीं हैं,  “बोलो क्या करते ?”

मैं भी बिना कुछ सोचे युँ ही बड़ा संजीदा पलटवार क जाता हूँ, “अगर कुछ करता ,तो भला आजाद कैसे होता ?”

“अच्छा तो फिर पैसे कहाँ से आते ?”,झट से बोल पड़ती हैं वो ।

मैं उस कुर्सी को भी अपने बोझ से आज़ाद कर घाँस वाली नर्म जमीन पर लेट जाता हूँ ।

खुद की कही बात समझा नहीं, पर उन्हें पूरज़ोर समझाता हूँ ।

कहता हूँ , “देखो उन चीटियों को मुँह में मिट्टी के लड्डू लिए,उस कुत्ते को धुप में मिट्टी पे लोटते हुए या उस पतंग को ही देख लो जो आसमान में नाच कर अपने रंग बरंगे फ्राॅक पर इतरा रही है,उन हवाओं से मानो बातें कर, अपने डोर से टूट कर आसमान में खो जाने की तरकीब बना रही है ।”

वो उठ कर जाने लगतीं हैं कहतीं हैं ,”ये तूम और तूम्हारी बातें,इनसे बस गहरे हैं तूम दोनों के ही नातें ।”

पीछे वाले कमरे की वो पेंडूलम वाली घड़ी परेशान नहीं करती इन चीटियों को,उस कुत्ते को,या मौन साधना में लीन उन कुर्सीओं को ।

तभी वो चिल्लाती हैं, “जल्दी से नहा लो ,26 जनवरी की परेड आने वाली है टी.वी. पर ।”

मैं उस गर्म और संजीदा आसमान के नीचे सोचता हूँ कि, हमारे लिए तो ये आसमान आजा़द है,

पर कहाँ आजा़द है ये?

ये भी तो है इस धरती के बंधन में ।

वर्ना उड़ कर क्यों न छिपता, ये अंतरिक्ष के दामन में ?

शायद आज़ादी के मायने सच्चे हों बंधन में ?

आज़ादी तो बसती है प्रकृति के कण कण में ।

बस नज़रिये का फर्क है,वर्ना बिना खुटे के भी वो ऊंट है एक अनजाने से बंधन में ?

हम भी आज़ाद कहाँ हैं ,रोज़मर्रा के जीवन में ?

पर खुश हैं हम सब ,आजादी को बस देख कर उस दर्पण में ।

 

 

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