वो मुझ जैसे न थे और मैं उनसा न था ।

कभी कभी लोगों को देखकर ये सोचता हूँ,कि कुछ तो बात है इनमे कि ये मुझ जैसे नहीं ।फिर सोचता हूँ,कि ये लोग हैं आईने नहीं जिनमे मैं खुद ही को देखुँ ।

फिर ज़रा करीब जाता हूँ, तो लगता है कि मुझ जैसे ही हैं ये सब ।अब एक अजीब अनकही दोस्ती सी हो जाती है इनसे ।

फिर जब गरमाहटें बढ़ने लगती हैं और नजदीकियाँ दस्तक देने लगती हैं ।इन दोस्तों से एक उम्मीद सी बंध जाती है।इस परखने और तौलने की गहमा गहमी में फिर एक बात दिल में घर कर जाती है कि ये दिखते मुझ जैसे ही हैं पर ये मुझ जैसे नहीं ।फिर टटोलने लगते हैं हम चीज़ों को ।और ज़रा अलग नज़रिये से देखने की कोशिश करते हैं इनको ।

 

वो झुठी तारीफें, बेमतलब लतीफें ।

वो बातों के शेर और करने में ढेर ।

वो उनकी ही दुनिया और खुदा वो खुद के ।

वो कागज़ के फूल और खुशबू है गुल ।

औरों के गम पे दिखते वो खुश

और उनकी खुशी पे हो जाते फुस्स ।

पैसा मदारी और ये उसके बंदर ।

जाने क्या पाते उस कागज़ के अंदर ?

दौड़ रहें हैं जाने कैसी दौड़ ?

पता ही नहीं ,है जाना किस ओर ?

पता इनको है सारी ज्ञान की बातें ।

मगर खुद पे आती तो कुछ कर न पाते ।

सम्भलती नहीं इनसे रिश्तों की अनबन ।

मगर ढूंढते हैं ये मंगल पे जीवन ।

खुद की ही खुशी में लगे ये सभी हैं ।

और कहते हैं कि ये दुनिया ही मतलबी है ।

इन्हे देख कर फिर लगता है ऐसा,

कहीं तो नहीं मैं भी उनके जैसा ?

लगता है फिर कि क्या इसमे नया था ?

कुछ वो मुझमे थे और कुछ मैं उनसा था ।

सोचो अगर हर इंसा यही सोचता था ।

और अपनी ही गुमानियों में चलता था ।

औरों से अलग दिखने की चाह रखता था ।

इस जहाँ से वो जब जब हारता था ।

वो मन में ये सारे भरम पालता था कि,

“वो मुझ जैसे न थे और मैं उनसा न था ।”

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