ऐ ज़िन्दगी!!

ऐ ज़िन्दगी आ ज़रा बैठें सुकून से,

चंद लम्हें गुजारें,बेमतलब गुफ्तगू के।

वो जज्बात सच्चे मैं तुझको सुनाऊं।

तू समझे गर कुछ कह भी न पाऊं।

उन रिश्तों नातों की खोखली दुनिया दिखाऊं।

हंसे तू संग मेरे इस जहां के सारे मुखौटे जो दिखाऊं।

तुझे वो सुनी हुई कहानियां फिर सुनाऊं।

सो जाए तू तो खुद पे ही मुस्काऊं।

तेरी मासूम हंसी से मैं सूरज को जगाऊं।

अलसाए जो तू तो तुझे मैं गुदगुदाऊं।

है कैसी ये हड़बड़ी,ये लम्हें तेरे जादू से।

बदली सी लगती है तू,या थी ऐसी ही शुरू से?

ऐ ज़िन्दगी आ ज़रा बैठें सुकून से,

चंद लम्हें गुजारें,बेमतलब गुफ्तगू के।

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Somewhere Beyond

Somewhere Beyond those truth and lies.
Somewhere Beyond those lovely skies.
Somewhere Beyond, there is a world,
Different from ours,but yet so same.
Where things are done, not just for fame.
Being black or white is not a shame
And you don’t exist because of your surname.
Where winning or loosing is not only the aim.
Life is like those kids game.
Where winners and loosers both are same.

Somewhere Beyond those mesmerizing eyes.
Somewhere Beyond those lows and highs.
Somewhere Beyond those truth and lies.
Somewhere Beyond those lovely skies.

नई-पुरानी, वही कहानी

इन खेतों खलिहानों से ही एक नौजवान ने कुछ ख्वाब बुना था।
घर परिवार थे हरे भरे पर पैसों से जरा सूना था।

रात दिन एक कर इन ज़मीनों पे सोने उगाता था।
हरे भरे इन खेतों को देख मन ही मन मुस्काता था।
शहर से लौटे राहगीरों से अरारियों पे गप्पे लड़ाता था।
रातों रात काम मेहनत में ही अमीर बन जाने के किस्सों से वो चौंधियाता था।
थक कर रातों को शहरों के ख्वाबों में वो खो जाता था।
सूरज से पहले उठ गाय-बैलों को नहलाता था।
पहली किरण के साथ ही फिर खेतों पर डट जाता था।
गुस्साए सूरज से छिप,नीम के निचे जो थोड़ा सुस्ताता था।
यही सोचता था वो अक्सर की अपनों से दूर शहरों में कहा वो ये सुख पाता था?
शाम को लालटेन की रौशनी में जब बच्चो को पढ़ता वो पाता था।
गौरव से भर जाता था वो,अपनी किस्मत पे इतराता था।
खड़ी फसल की रखवाली को खेतों पे जब जाता था।
यारों के संग मचानो पर वो पाला भी उसे सुहाता था।
यारों से बिछड़न की बात सोच कर भी वो सिहर सा जाता था।
“अपने आसमान में ढल जाना ही उस सूरज की नियति है”
ऐसी बातों से उन्हें समझाता था।

पर नियति तो है महाबली,उसके आगे भला किसकी चली?
सूखे की मार से पुरे गाँव में मच गयी खलबली,
शहर जाने को भीड़ खड़ी थी हर चौराहे और गली गली।
पर था कहा वो डरने वालों में ?
और ना ही आहें भरने वालों में,
हौसलें तो प्राण फूंक देते थे अधमरे या मरने वालों में।
इस विकट घड़ी में भी उसने एक बात मन में ठानी थी,
पुरखों की इस धरती पर वापस गंगा की धरा लानी थी।
उस हल से ज्यादा आँखों में तेज़ लिए जब खेतों की ओर कदम बढ़ाता था।
उस तेजस्वी रूप को देख, खुद काल भी भय खा जाता था।
तपती दुपहरी में तन के पसीने से धरती की प्यास बुझाता था।
उस साहस और हौसले को देख प्रकृति का रोम रोम खिल जाता था।
उन मज़बूरों को अन्धकार में उजाले की आस बंधाता था।
सारी दुनिया से जीत कर जब वापस घर को आता था।
घरवालों के तानो से खुद अपनों से ही हार वो जाता था।

आखिर रंग लायी उसकी मेहनत बड़ी।
खेतों में लहलहाती थी सोने सी फसल खड़ी।
पूरे गाँव में उसके मेहनत की होने लगी चर्चाएं बड़ी।
अब इन पैसों से वो साहूकार के बोझे से निकल जाता था।
बहन की शादी में गहनों की कमी को दूर कर पाता था।

कहानी उसकी आगे बढ़ी और न‌ई मुसीबतें होने लगी खड़ी
बढ़ते उसके परिवार के संग विपदाएं भी होतीं गयी बड़ी

थक हार कर उसने भी अब शहर जाने को ठाना था।
अब जीवन का उद्देश्य उसका बस पैसा ही कमाना था।
उस पैसे के दम पर अपने परिवार का जीवन सुखमयी बनाना था।

वो चला शहर की ओर,यहाँ चकाचौंध थी चारों ओर,
इन पिली उजली रौशनी के गुब्बारों से थी हरदम ही भोर।
गाँव को छो‌‌‍‌ड़ वो था ज़रा भाव विभोर,
पर मन में थी एक आस की फिर लौटेगा गाँव की ओर।
काम से थक कर जब सोता था, तो यहाँ भी होती थी उन गावों वाली ही भोर ,
बस चूल्हे के धुएं की जगह फैक्ट्रियों के धुएं ही थे हर ओर।
शहरों की आपाधापी से कभी जब उसका मन उचट सा जाता था,
गाँव के अपने दिनों को याद कर आंसू की धारा बहाता था।
मनी आर्डर के जवाबी खत को पाकर उसका रोम रोम खिल जाता था।
पिंटू के अंग्रेजी स्कूल में दाखिले की खबर से वो इठलाता था।
बूढी माँ के उसकी सलामती की चिंता को पढ़ गमगीन हो जाता था।
पता नहीं उस खत में ऐसा क्या वो पाता था,
अगली सुबह एक नयी ऊर्जा से मानो वो भर जाता था।
गाँव जाने के उस सपने को लेकर मजबूत कदम बढ़ाता था।
त्योहारों पर छुट्टी लेकर गाँव को वो जाता था,
शहरों की कहानिया सुन माहौल ठहाकों से भर जाता था।
पर दोस्तों से गाँव में लूट मार की घटनाओ का विवरण पाता था।
वापस परिवार को छोड़ शहर जाने से वो घबराता था
पर उस कागज़ के टुकड़े से खुश,परिवार को देख वो भी खुश हो जाता था।
ख़ुशी वाले इन कागज़ों को बटोरने फिर शहर निकल वो जाता था।
माँ की बिगड़ती सेहत की खबर जब वो खतों में पाता था,
धिक्कारता था वो खुद को जो माँ की सेवा छोड़ बेकार ही शहर में समय गवाता था।
अब वो परिवार को भी शहर में बसाने का मन बनाता था।
उनके खातिर एक बड़े घर का ख्वाब भी वो सजाता था।
उस ख्वाब को मन में लिए अब ज्यादा समय इन फैक्ट्रियों में ही वो बिताता था।

समय की गति थी या खुद समय ही गति बन जाता था
जब एक बूढ़े से उसका पोता कहानियां सुनने की ज़िद कर जाता था।
कल की ही बातों को वो कहानियों में बुन कर सुनाता था, वो कहता ” इन खेतों खलिहानो से ही एक नौजवान ने कुछ ख्वाब बुना था,
घर परिवार थे हरे भरे पर पैसों से ज़रा सूना था।
दूर देशों में खजाने की कहानिया सुन उन राहों को उसने चुना था।
पर खजाने नहीं थे उन देशों में,वहाँ तो सब कुछ ही सूना था।
अंत में लौट कर उस मिटटी के घर में खजाने को जब वो पाता था।
हँसता था अपनी किस्मत पर,
और जीवन के आँख मिचौली के खेल को समझ जाता था।
अब खजाना तो वही था,पर अब अपने नहीं थे वहाँ और वो घर भी अब उन दूर देशों जैसा ही सूना सूना था।”

“दादाजी ये कहानी तो मैंने है कई बार सुनी,पर आखिर कौन था वो नौजवान जो खजाने को पाकर भी ना हो सका धनी?”
उस बूढ़े ने हँसते हुए कहा ,”वो नौजवान मेरे दादाजी थे, मेरे पिताजी हुए,फिर मैं हुआ ,अब तुम्हारे पिताजी हैं,और कल तुम खुद ही होगे।
सच है की ये कहानियां तो हम सब ने है कई बार सुनी पर उस दूर देश में किसी खजाने के पीछे भागने ही लग जाते हैं हम, कर इस कहानी को अनसुनी।
अंत में जान ये पाते है की अपनों के बीच उस छोटे से मिटटी के घर में ही छिपी थी उस ख़ज़ाने की चमकीली रौशनी।
शयद उन दूर देशों की राह ही थी गलत जो थी हमने चुनी।”

कुछ करते क्यों नहीं ?

वो कहते है, कुछ करते क्यों नहीं ?
सूट बूट और फर्राटेदार अंग्रेजी के साथ ज़रा सवरते क्यों नहीं ?
देखो शर्मा जी के बेटे को कितना होशियार है ।
बन ठन के रहता है और अंग्रेजी भी फर्राटेदार है।
अरे पर्सनालिटी नाम की भी कोई चीज़ होती बरखुद्दार है।
गुमसुम से रहते हो तुम और इस दुनिया की तो अलग ही रफ़्तार है।
हमेशा हाफ पैंट टीशर्ट और चप्पल में रहने की क्या दरकार है?
सूट सारे रूठे पड़े है अलमारी में इनसे भला क्या तकरार है?
तुम्हे पता है अंग्रेजी कितनी बड़ी हथियार है?
बस कुछ भी बड़बड़ा दो ,इज्जत बेशुमार है।
अंग्रेजी माध्यम से पढ़े हो,तो मेहमानो के सामने अंग्रजी के नग्मे पढ़ते क्यों नहीं ?
और बाहर रिक्शेवाले पे अंग्रेजी में बिगड़ते क्यों नहीं ?

मेहमान बन कर आते हैं मकसद बस एक कि,” हम आपसे होशियार हैं !”
अमेरिकी चुनाव का कुछ पता हो न हो पर भिड़ने को तैयार हैं ।
जब अपने फ्रंट वालों के ढीले पड़ते कुछ तार हैं
आवाज़ लगाते हैं मुझे,तब पता चलता है कि अपने नाम के झूठे कसीदे भी तैयार हैं ।
कसीदों कि रफ़्तार और ख़त्म न होने कि जिद को देख मेहमान बोल पड़ता है “वाह लड़का तो काफी होशियार है!”
हमारे फ्रंट वाले चेहरे पर मुस्कान लिए मन ही मन कहते हैं,”देखा,अपना घरेलु मिसाइल भी तैयार है ।”
फिर डींगों कि लड़ी सी लग जाती हैं उसकी तो इनके पास भरमार है।
मुझे बीच में न पड़ता देख होता कोहनी का हल्का सा प्रहार है।
मेहमान भाँप जाता है,कहता है, ” अरे छोड़िये पांडेय जी, आजकल के बच्चों में अब कहाँ वो संस्कार है ?”
देवता सामान मेहमान के जाने पर फिर लगती वही पुरानी फटकार है,
“मूरत बन कर बैठे रहते हो,क्या बोलने कि इतवार है ?”
हर बात में घुस कर बोल जाता है और मुँह बंद कर देता है पढ़े लिखों की तुमसे तो अच्छा अपना पप्पू ठेकेदार है।
टी.वी पर तो दिन रात देखते हो चर्चाये तो फिर उनमे पड़ते क्यों नहीं ?
बड़े शहरों को देखा है तुमने, तो फिर बड़ी बड़ी बातें करते क्यों नहीं ?

किसी कि मैयत पे जाते है,कुछ देर सांत्वना भरी बातें कि ,”खुदा को भी नेक बन्दों से ही प्यार है। ”
फिर शुरू वही रोज कि बातें कि नर्सरी के एडमिशन में चलती कितनी जुगाड़ है।
बाबू जी कि मरनि पे जो कपडा मंगाया था वही अब दुगने का है बताईये साहब महंगाई कि कितनी मार है ?
अरे वो छोड़िये इस सूचि में लिखाये आधे से ज्यादा सामान बेकार हैं।
पंडित भी लगे हैं लूटने में हर जगह ही भ्रष्टाचार है।
मरने वाला भी सोच रहा होता है कि मैं यहाँ मरा पड़ा हूँ और तुम सब के लिए ये त्यौहार है ?
जब खुद एक दिन आओगे यहाँ तब समझोगे कि जो सब जीत रहे हो तुम वो सब एक हार है।
अच्छा ही था कि समय पे निकल लिया तुम सब के साथ तो जीना भी बेकार है।
तभी बहार से पंडित कि आवाज आती है कि अरथी तैयार है।
गपशप कि आवाजें अचानक ही रोने बिलखने लगतीं हैं अंदर तो पूरी नाटक मंडली ही तैयार है।
मुझे हक्का बक्का देख कहते हैं खुल कर रोते क्यों नहीं?
हल्के हो जाओ ज़रा अरमानो को खुद के भीतर ढोते यूँ नहीं।

मन को कचोटती हैं ये बातें, किसी शांत जगह पर जाता हूँ।
मन कि आवाज़ें सुनने, आखिर ये मन ही तो अपना सरदार है।
देखता हूँ एक गाय को अपने बछड़े को चाट कर जताती वो अपना प्यार है।
हैरान हो जाता हूँ ,चैन से सोये उस बछड़े को देख।
कहाँ प्यार जताने को फेसबुक की दरकार है ?
हमें भी तो बनाया था ऐसा ही, पर हमने तो बना लिया अपना एक अलग ही संसार है।
एक दूजे को नीचा दिखाना है और कुछ पाने का अहंकार है।
ख़ुशी के सामान जुटाने में लगे हैं पर खुशी की तो हड़ताल है।
फिर सोचता हूँ कि एक दूसरे कि मुस्कुराहटों को हम सहते क्यों नहीं ?
कहते तो हैं कि अलग हैं पांचो उंगलिया तो फिर मुट्ठी बन कर रहते क्यों नहीं ?
कुछ दिन तो हैं इस रंगमंच पर फिर एक दूसरे के लिए कुछ करते क्यों नहीं ?

देवी

वो बारिश के दिन थे ,शाम को हो रहीं थीं कुछ गपशप,कुछ बातें ।
छुट्टियों में थें हम तो याद करतें पुराने अच्छे दिनों वालीं जज़बातेँ।
तो बातों बातों में माँ ने खोले बंद वो पिटारें
और अचानक मानो बदलने लगें वो मौसम वो नज़ारें ।
थी सामने दो चोटियों में एक छोटी सी लड़की।
हँसती तो मानो सच्चे ज़ज़्बातों वाली खुल जाती कोई खिड़की ।
हवाओं में बहती वो, न कोई ज़ज़्बात छिपाती।
जीने की कला बड़े बूढ़ों को सिखाती ।
न थी बहुत ही सुन्दर,न फ़िल्मी सी थी वो।
मिटटी में मैली, जैसे धरती पुत्री सीता खड़ी हो।
उन खेतों की हवाओं सी आज़ाद थी वो।
शायद नए कल की आगाज़ थी वो ।
बहते नाक को भूल,भाईओं को चैन की नींद थी सुलाती ।
दालमोट खाने को जतन कर कुछ पैसे जुटाती।
मेलों में जाने को सखियों संग चोटी बनाती।
कागज़ की घिरनियों को देख उसके भीतर थी खुशी मुस्काती।
बाबूजी की कल वाली फटकार झट भूल जाती।
रिश्ते नातों वाले खेलों में बूढी दादी बन जाती।
खुद उस मैले से फ्रॉक में जूट की गुड़िया की रंग बिरंगे फ्रॉक थी बनाती।
घिसे चप्पल में भी सपने देख़ने से न कभी घबराती।
मेहमानो के आने पर उनकी थाली को तकती ही जाती ।
जाते ही उनके हर दाने को चट कर जाती।

दशहरे में जब गांव में रामलीला थी आती ।
उसकी तो मानो दुनिया ही बदल जाती।
अब पहाड़ो और दोहों को रटने से फुर्सत मिल जाती।
जूट के बोरों की दरियाँ चमकाती ।
निकलते सूरज के संग नहा धो कर, छोटे भाइयों को सजाती।
शाम को रामलीला में उस दरी पर रंग बिरंगे भाइयों को देख खुद पर इतराती।
रामलीला की कहानियां उसे कुछ समझ ना आतीं।
और भाइयों के संग वो भी उंघाती।

शायद दूसरों की ख़ुशी में खुश रहने की इस कला ने ही उसे उनसे अलग बना डाला ।
आज भी वो भूखी रह जाती है की बढ़ जाए एक बच्चे का निवाला।
उसकी कुर्बानियों को, हमने उसका फ़र्ज़ बना डाला।
एक आज़ाद सी लड़की को परतों में दबा कर, हमने उसे देवी बना डाला।

दिल के अंदर कुछ टूट रहा

याद है वो बचपन की जलेबी की दौड़,
बस एक जलेबी की चाह, न कोई सिरमौर।
ये कहा निकल गए हम, था जाना किस ओर ?
अब पीछे मुड़ कर देखता हूँ, तो लगता है कुछ छूट रहा।
बाहर से खुश दिखते हैं ,पर दिल के अंदर कुछ टूट रहा।
वो मेलो में,उन चार आने के खेलों में।
वो फुचके के उन ठेलों में।
वो ज्यादा खा जाने की होड़ माँ की गरम कचौड़ी में।
तनिक बुरा न लगता था ,घिसे चप्पल की भागा दौड़ी में।

वो तितलियों के पीछे भागना और उनके घरों को सजाने में।
बिजली गुल हो जाने पर ,देर रात गपियाने में।
वो बौखलाना खुद पर रोज नए रूटीन का कुछ भी न कर पाने में।
और सुबह सुबह माँ की फटकार,किताब पर गिर जाने में।
कितनी तरकीबें लगाते थे हम दूरदर्शन पर फिल्मे पूरी शिद्दत से देखे जाने में
और माँ को ताने देते थे ,कुछ नया चाहिए खाने में।

अब देखता हूँ जब दूर से खुद को तो लगता है भोला सा मन वो घुट रहा।
सब कुछ तो ठीक ही लगता है, पर दिल के अंदर कुछ टूट रहा।

वो रजाई की गुफाओ में और रेत की सुरंगो में दिल धड़क सा जाता था कटने पर उड़ती पतंगों में।
पैसे खूब जुटाते थे हम खाने को चौमिन के ठेलों में।
जान झोंक देते हम उन बेमतलब के खेलों में।
खूब मौज हम करते थे परीक्षा खत्म हो जाने में।
प्राण सुख से जाते थे परिणाम को घर तक लाने में।
कभी बुरा न लगता था खुद के छोटे हो जाने में।
संकोच कभी न करते हम यारों को गरियाने में।
मज़ा और ही होता था घर वाले खेलों में रोल निभाने में।
खूब जतन हम करते थे पकड़ने परिंदे गेहूं के दाने में।
अब कहते है ज़िन्दगी की बाधाओं को तू कूट रहा।

सब कुछ तो ठीक ही लगता है,पर दिल के अंदर कुछ टूट रहा।
रोम रोम खिल उठता था बारिश में भीग जाने में।
मज़ा अलग ही होता था बरसाती नाले में नाव चलाने में।
उस आंधी में ,बेमतलब कूदा फन्दी में ,खाना चख लेना हांडी में।
अब मजा कहा वो आता है इन सोने और चांदी में।
अलग स्वाद ही होता था गर्मी की बर्फ मलाई में।
कितने खुश हो जाते थे हम बाँध नकली घड़ी कलाई में।
रोज़ ध्यान से सुनते थे हम दादी की उसी कहानी को।
खूब मज़े से पीते थे शरबत और नीम्बू पानी को।
अब लगता है मेरे आगे पर्वत का सीना भी टूट रहा।
कितनी चढ़ाईयां चढ़ ली हमने पर जाने क्या पीछे छूट रहा।
सब कुछ तो ठीक ही लगता है,पर दिल के अंदर कुछ टूट रहा

कहते हैं ,एक ब्रह्मा है।

कहते हैं, एक ब्रह्मा है,और उसकी रची एक दुनिया है ।
पड़ जाये उसकी नज़र जिस ओर,वही हरियाली, उस ओर ही सारी खुशियां हैं।

और जो मूंद ले वो आँखे, तो खत्म ये सारी दुनिया है।
पर कुछ नहीं मानते,कहते है ,”जो दिखती है ,बस वही हमारी दुनिया है ।
इसके परे ,न तो जीवन है और न ही ऐसी कोई दुनिया है ।”
चलो मान लेते है इनकी बातों को,पर बहस से जरा अलग जा कर देखते है चीजों को ।
देखे ज़रा की क्या समझ पाएंगे हम उस विशाल बरगद के उन छोटे से बीजों को ?
चिड़ियों की चहचाहट से उठता वो कुम्भार है।
नहा धो कर अब उस मिटटी को अपने ख़्वाबों की मूर्तियों में बदलने को तैयार है।
लोग कहते है,”उसकी हाथों में जादू है, मिटटी में जान दाल देता है ,क्या खूब कलाकार है!”
हमारे बचपन का खिलौना,त्योहारों का दिया,गर्मी की ठंढक और अंतिम पड़ाव पर बरगद पर लटका वो कलश, हमारी हर छोटी से बड़ी चीजों में शामिल वो कुम्भार है ।
इन मिटटी के ख्वाबों से चलाता वो अपना घर बार है।
ये मिटटी ही उसकी दुनिया उसका संसार है ।

दिन भर उलझा रहता है वो, उसकी एक छोटी सी दुनिया है।

पर आँखे मूंदते ही ,जैसे विलीन हो जाती उसकी ये सारी दुनिया है।
शून्य सा हो जाता है वो और इस शून्यता में गुम हो जाती उसकी दुनिया है।
कहते है एक ब्रह्मा है,और उसकी रची एक दुनिया है ।
कहते है पड़ जाये उसकी नज़र जिस ओर,वही हरियाली, उस ओर ही सारी खुशियां हैं।

और जो मूंद ले वो आँखे, तो खत्म ये सारी दुनिया है ।।